Sex story दोस्त की विधवा बहन के साथ रातें
sex story दोस्त की विधवा बहन के साथ रातें
नोएडा की उन ऊँची इमारतों के बीच, जहाँ हर फ्लैट एक अलग दुनिया लगता है, राजेश का अपार्टमेंट १४वीं मंजिल पर था। खिड़की से बाहर दिल्ली की लाइट्स झिलमिलाती थीं, लेकिन अंदर का माहौल ठंडा और भारी था। सर्दी की शुरुआत हो चुकी थी। रात के ग्यारह बज चुके थे। राजेश सोफे पर बैठा था, हाथ में ठंडी कॉफी का मग, लेकिन घूँट नहीं भर पा रहा था। सामने वाली सोफे पर प्रिया बैठी थी। सफेद सूट में, बाल खुले, आँखें लाल। वो अभी-अभी अस्पताल से लौटी थी। उसका भाई—राजेश का सबसे पुराना दोस्त, अमित—दो दिन पहले ही इस दुनिया से चला गया था। हार्ट अटैक। सिर्फ ३४ साल की उम्र में। प्रिया अब अकेली थी। माँ-बाप पहले ही नहीं थे। पति नहीं था—अमित की मौत से पहले ही तलाक हो चुका था। अब सिर्फ ये छोटा-सा अपार्टमेंट, कुछ पुरानी यादें, और राजेश का कंधा।
राजेश ने अमित से वादा किया था। “भाई, अगर कभी कुछ हुआ तो प्रिया को अकेला मत छोड़ना।” अमित हँसकर कहता था, “अरे यार, मैं जिंदा हूँ।” लेकिन अब वो वादा सच हो चुका था। प्रिया तीन दिन से यहीं रुकी थी। राजेश ने खुद ही कहा था—”यहाँ रहो। अकेले घर मत जाओ।” प्रिया ने हाँ कह दी थी। क्योंकि उसके पास और कोई जगह नहीं थी।
रात गहरी हो रही थी। टीवी बंद था। सिर्फ फ्रिज की हल्की सी हमिंग। प्रिया ने धीरे से कहा, “राजेश… मैं जाऊँ?” राजेश ने सिर हिलाया—”कहाँ? रात के इतने बजे? नीचे टैक्सी भी नहीं मिलेगी।” प्रिया ने आँखें नीची कीं। “मुझे लगता है… मैं बोझ बन रही हूँ।” राजेश का गला रुँध गया। वो उठा, प्रिया के पास बैठ गया। “ऐसा मत सोचो। तुम मेरी… मेरी बहन जैसी हो।” शब्द कहते हुए राजेश को खुद पर शक हुआ। बहन? क्या सच में सिर्फ इतना ही था? सालों से प्रिया को देखता आया था। अमित के साथ जब वो पार्टी में आती थी, हँसती थी, तो राजेश की नजरें उस पर ठहर जाती थीं। गोरी, लंबी, आँखें गहरी, होंठ गुलाबी। लेकिन वो हमेशा खुद को रोकता था। “दोस्त की बहन है।” अब वो बहन नहीं रही थी। वो विधवा थी। अकेली। और राजेश के सामने।
प्रिया ने राजेश का हाथ पकड़ा। “तुम्हारे बिना… मैं टूट जाती।” उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। राजेश ने उन्हें दोनों हाथों में लिया। गर्माहट देने की कोशिश। लेकिन उस स्पर्श में कुछ और था। एक करंट। प्रिया ने नजरें उठाईं। आँखें मिलीं। लंबी चुप्पी। राजेश का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। प्रिया की साँसें तेज। वो करीब आईं। राजेश ने पीछे नहीं हटा। प्रिया का सिर उसके कंधे पर टिका। राजेश ने धीरे से उसके बाल सहलाए। “सब ठीक हो जाएगा,” वो फुसफुसाया। लेकिन मन में तूफान था। प्रिया की महक—हल्की परफ्यूम और आँसुओं की नमकीन—उसे मदहोश कर रही थी।
अगले दिन सुबह। प्रिया ने चाय बनाई। राजेश ऑफिस गया। लेकिन मन कहीं और था। शाम को लौटा तो प्रिया ने खाना बनाया था। दोनों साथ बैठे। बातें कम। नजरें ज्यादा। प्रिया ने कहा, “राजेश… मुझे घर जाना चाहिए।” राजेश ने कहा, “नहीं। अभी नहीं।” प्रिया मुस्कुराई। पहली बार। “तुम्हें तकलीफ हो रही है?” राजेश ने सिर हिलाया—”नहीं। तुम्हारे बिना… घर सूना लगता है।” शब्द निकल गए। दोनों चुप। प्रिया ने धीरे से कहा, “मुझे भी।”
रात फिर आई। इस बार ठंड और गहरी। राजेश ने हीटर ऑन किया। प्रिया कमरे में आई। नाइट गाउन में। पतला कपड़ा। शरीर की आकृति साफ दिख रही थी। राजेश की नजरें उस पर ठहर गईं। प्रिया ने देख लिया। शरमाई। लेकिन नजर नहीं फेरी। राजेश उठा। “सो जाओ।” प्रिया बोली, “नींद नहीं आ रही।” वो राजेश के पास आई। “बात कर सकते हैं?” दोनों सोफे पर बैठे। राजेश ने कहा, “प्रिया… मैं तुम्हें दुख नहीं देना चाहता।” प्रिया ने कहा, “तुम दुख नहीं दे रहे। तुम… सहारा दे रहे हो।” उसने राजेश का हाथ लिया। इस बार उँगलियाँ आपस में फँस गईं। राजेश का दिल तेज। प्रिया करीब आई। उसका चेहरा राजेश के चेहरे के इतना पास कि साँसें मिल रही थीं। राजेश ने धीरे से उसके गाल को छुआ। प्रिया ने आँखें बंद कीं। राजेश ने होंठ उसके होंठों पर रख दिए। नरम। हल्का। प्रिया ने जवाब दिया। चुंबन गहरा हुआ। जीभें मिलीं। दोनों के शरीर सटे। राजेश के हाथ प्रिया की पीठ पर। प्रिया की साँसें तेज।
वे दोनों बेडरूम में चले गए। राजेश ने लाइट कम की। प्रिया बिस्तर पर बैठी। राजेश उसके सामने घुटनों पर। “प्रिया… अगर तुम नहीं चाहतीं तो…” प्रिया ने राजेश के होंठों पर उंगली रखी। “मैं चाहती हूँ। बहुत दिनों से।” राजेश ने उसे गले लगाया। प्रिया का शरीर काँप रहा था। राजेश ने नाइट गाउन के स्ट्रैप्स नीचे किए। प्रिया की छाती बाहर। स्तन गोल, निप्पल्स सख्त। राजेश ने उन्हें छुआ। प्रिया सिसकारी—”आह…” राजेश ने मुँह में लिया। चूसा। प्रिया की उँगलियाँ राजेश के बालों में। “राजेश… कितना अच्छा लग रहा है…” राजेश नीचे गया। नाइट गाउन पूरी उतारी। प्रिया नंगी। उसकी चूत गीली। राजेश ने उँगली से सहलाया। प्रिया की कमर उछली। “ओह्ह… छुओ…” राजेश ने जीभ लगाई। चाटा। प्रिया चीखी—”आह… राजेश… और…” वो झड़ गई। राजेश ऊपर आया। प्रिया ने राजेश के कपड़े उतारे। उसका लंड सख्त। बड़ा। प्रिया ने पकड़ा। सहलाया। “कितना गरम… कितना मोटा…” राजेश ने प्रिया को लिटाया। लंड चूत पर रखा। धीरे से धक्का। प्रिया की आँखें बंद। “आह… अंदर…” राजेश अंदर गया। धीरे-धीरे धक्के। प्रिया की गांड दबा रहा था। “तेरी गांड कितनी नरम… कितनी गरम…” प्रिया बोली—”जोर से… चोदो मुझे…” राजेश तेज हुआ। दोनों की सिसकारियाँ। पसीना। आखिर राजेश झड़ गया। प्रिया के अंदर। दोनों थककर लेटे।
अगले दिन प्रिया ने कहा, “ये गलत था?” राजेश ने कहा, “नहीं। ये हमारा था।” प्रिया रो पड़ी। “अमित को पता चला तो?” राजेश ने गले लगाया। “वो हमें देख रहा होगा। और खुश होगा।” प्रिया ने कहा, “मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।” राजेश ने कहा, “मैं भी नहीं।”
दिन बीतते गए। प्रिया अब राजेश के साथ रहने लगी। समाज में वो बहन जैसी। लेकिन रातें उनकी। छिपकर। गहरी। प्रिया की चूत राजेश के लंड के लिए तरसती। राजेश प्रिया की गांड को दबाता, चूमता। दोनों एक-दूसरे में खो जाते। लेकिन मन में अपराधबोध। “क्या हम गलत कर रहे हैं?” प्रिया सोचती। राजेश सोचता, “अमित माफ कर देगा।”
एक रात प्रिया बोली, “राजेश… मैं तुम्हें प्यार करती हूँ।” राजेश ने कहा, “मैं भी। बहुत।” दोनों लिपटे। कोई जल्दबाजी नहीं। सिर्फ स्पर्श। साँसें। प्यार। वो जानते थे—ये रिश्ता समाज कभी नहीं मानेगा। लेकिन उनके लिए ये सब कुछ था। अमित की याद में। उनकी कमी को भरते हुए। और एक नई शुरुआत में। नोएडा की इन ऊँची दीवारों के बीच, जहाँ हर कोई अकेला है, वो दोनों अब अकेले नहीं थे। उनका राज था। उनका दर्द था। और उनका प्यार था। जो कभी खत्म नहीं होगा। बस छिपा रहेगा। हमेशा।
