Sex story देवर भाभी सेक्स – देवर अंकित की हॉट चुदाई में डूब जाती है भाभी
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गुरुग्राम की सेक्टर-56 की उस लग्जरी सोसाइटी में, जहां हर सुबह लिफ्ट में लोग चुपचाप अपने फ्लोर का बटन दबाते और शाम को बालकनी पर खड़े होकर शहर की चमकती लाइट्स देखते, हमारा फ्लैट 9वीं मंजिल पर था। मैं, अंकित, 26 साल का, आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर। दिन भर कोडिंग, मीटिंग्स, डेडलाइन्स। घर लौटते ही थकान, लेकिन भाभी नेहा की मुस्कान देखकर सब भूल जाता। भाई रोहित, 32 का, उसी कंपनी में सीनियर मैनेजर। वो हमेशा व्यस्त रहता – ऑफिस, क्लाइंट मीटिंग्स, वीकेंड पर भी काम। भाभी नेहा, 29 की – गोरी, भरी-भराई बॉडी, कटे बाल जो कंधों पर लहराते, होंठ गुलाबी, आंखें ऐसी कि एक नजर में दिल डोल जाए। शादी को चार साल हो गए थे, लेकिन बच्चा नहीं हुआ। बाहर से सब परफेक्ट लगता – खुशहाल जोड़ा, अच्छा घर, अच्छी जिंदगी। लेकिन अंदर, एक ऐसी चाहत सुलग रही थी जो धीरे-धीरे आग बन गई।
शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई। भाई अक्सर लेट आता। नेहा अकेली रहती। मैं ऑफिस से लौटकर बातें करता। कभी हंसती, कभी उदास हो जाती। एक दिन वो बोली, “अंकित, तू इतना अच्छा क्यों है? रोहित को देखो, दिन-रात काम।” मैंने कहा, “भाभी, वो मेहनत करता है हमारे लिए।” वो मुस्कुराई, लेकिन आंखों में कुछ था। फिर वो दिन आया जब भाई को बैंगलोर का चार दिन का टूर मिला।
पहली रात। सितंबर की उमस भरी शाम। एसी चल रहा था, लेकिन पसीना फिर भी आ रहा था। मैं ऑफिस से जल्दी लौटा। नेहा किचन में थी। लाल साड़ी में – पतली साड़ी, ब्लाउज टाइट, पसीने से भीगा हुआ। उसके बाल खुले, कुछ लटें गाल पर चिपकी हुईं। वो मुड़ी, मुस्कुराई। “अंकित, आज जल्दी? खाना लगाऊं?” मैंने कहा, “भाभी, पहले तू थोड़ा आराम कर।” वो हंस पड़ी। “आराम? तू है ना मेरे साथ।”
खाना खाकर हम सोफे पर बैठे। लाइट्स डिम। नेहा करीब आई। उसकी साड़ी का पल्लू सरक गया। उसके स्तन की गहराई दिख रही थी। वो बोली, “अंकित… रोहित चार दिन नहीं रहेगा। घर बहुत सूना लग रहा है।” मैंने कहा, “भाभी, मैं हूं।” वो मेरी तरफ मुड़ी। उसकी आंखें नम। “तू सच में मेरी परवाह करता है?” मैंने उसका हाथ पकड़ा। “बहुत।” वो करीब आई। उसका सिर मेरे कंधे पर। उसकी सांस गर्म। मैंने उसकी कमर पर हाथ रखा। वो सिहर उठी। “अंकित… ये क्या कर रहे हैं हम?” मैंने कहा, “जो दिल कह रहा है।”
मैंने उसके होंठ चूम लिए। वो पहले रुकी, फिर जवाब देने लगी। उसकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी। वो किस इतना गहरा था कि सांस रुक गई। मैंने उसके ब्लाउज के हुक खोले। ब्रा बाहर। गोरे, भरे हुए स्तन। निप्पल सख्त, गुलाबी। मैंने उन्हें दोनों हाथों से दबाया। वो सिसकारी। “आह… अंकित… जोर से दबा… सालों बाद किसी ने ऐसे छुआ है…” मैंने एक निप्पल मुंह में लिया। जोर से चूसा। वो कमर उठाकर सिहर रही थी। “अंकित… ओह… चूस… मेरे स्तन तेरे हैं…” मैंने दूसरे को दांतों से हल्का काटा। वो चीख पड़ी। “आह… हां… ऐसे ही… काट… चूस… मेरे निप्पल को रस्सी बना दे…”
मैंने उसकी साड़ी का पल्लू खींचा। साड़ी नीचे। पेटीकोट का नाड़ा खोला। वो सिर्फ पैंटी में। मैंने घुटनों के बल बैठकर उसकी जांघें चूमीं। ऊपर की तरफ। पैंटी गीली। मैंने उसे उतारा। उसकी चूत – गुलाबी, बाल साफ, पहले से रस टपक रहा। मैंने जीभ लगाई। वो चीखी। “अंकित… चाट… मेरी चूत… बहुत जल रही है…” मैंने जीभ अंदर डाली। क्लिट को चूसा। वो मेरे बाल पकड़कर दबा रही थी। “आह… अंदर तक… जीभ से चोद… ओह… मैं झड़ने वाली हूं…” मैंने उंगलियां भी डालीं – दो उंगलियां अंदर-बाहर। वो कमर हिला रही थी। “अंकित… उंगलियां… और तेज… मेरी चूत को फाड़… आह…” वो कांपकर झड़ गई। उसका रस मेरे मुंह में बहा। मैंने सब चाट लिया।
फिर वो उठी। मेरी शर्ट उतारी। मेरी छाती चूमी। नीचे आई। मेरी पैंट उतारी। लंड बाहर – सख्त, मोटा, सुपारा चमक रहा। वो हाथ में लिया। “अंकित… कितना मोटा है तेरा… रोहित से दोगुना…” वो सहलाने लगी। फिर मुंह में लिया। जोर-जोर से चूसने लगी। जीभ सुपारे पर घुमा रही थी। गले तक ले रही थी। लार टपक रही थी। मैं सिसकारा। “भाभी… बहुत अच्छा… गहरा ले… आह… तेरी जीभ जादू कर रही है…” वो बोली, “अब डाल… मुझे तेरी जरूरत है।”
वो सोफे पर लेट गई। जांघें फैलाईं। मैंने लंड उसकी चूत पर रखा। धीरे से अंदर। वो कराही। “आह… अंकित… बड़ा है… धीरे…” मैं रुक गया। फिर धीरे-धीरे पूरा अंदर। वो चीखी। “हां… पूरा… अब चोद…” मैंने धक्के शुरू किए। धीरे से तेज। वो कमर हिला रही थी। “अंकित… जोर से… मेरी चूत फाड़ दो… चोद… आह… तेज… और तेज…” मैंने स्पीड बढ़ाई। उसके स्तन हिल रहे थे। मैंने दबाए। वो मेरी पीठ नाखूनों से खरोंच रही थी। “अंकित… अंदर झड़… मुझे भर दे… मैं तेरी हूं…” मैंने और जोर से धक्के मारे। एक साथ झड़ गए। मेरा गरम वीर्य उसकी चूत में भर गया। वो कांपकर थम गई।
दूसरी रात। किचन में। वो बर्तन धो रही थी। मैं पीछे से लग गया। लंड उसकी गांड पर। वो मुड़ी, मुस्कुराई। “अंकित… रोहित आने वाला है…” मैंने कहा, “जल्दी।” मैंने उसकी साड़ी ऊपर की। पैंटी साइड। लंड डाला। वो काउंटर पकड़कर झुक गई। मैं तेज-तेज धक्के मारने लगा। वो चीख रही थी। “अंकित… आह… चोद… तेज… मेरी चूत में आग लग गई… जोर से… काउंटर पर पटक… फाड़ दो…” मैंने उसके बाल पकड़े। पीछे से जोर से धक्के। उसके स्तन हिल रहे थे। मैंने एक हाथ से दबाया। वो झड़ गई। “अंकित… मैं झड़ रही हूं… तेरे वीर्य की गर्मी महसूस हो रही है…” मैं भी अंदर झड़ गया।
तीसरी रात। भाई घर पर था। लेकिन वो थककर सो गया। नेहा मेरे कमरे में आई। “आज पूरी रात।” मैंने उसे बिस्तर पर पटका। साड़ी खोल दी। वो नंगी। मैंने उसकी गांड पकड़ी। “भाभी… आज गांड में?” वो शरमा गई। “पहली बार… धीरे…” मैंने ऑयल लगाया। पहले उंगली डाली। वो सिहर उठी। “अंकित… आह… दर्द… लेकिन अच्छा…” फिर दो उंगलियां। वो कमर हिला रही थी। “अंकित… और अंदर… तैयारी कर रही हूं…” फिर लंड रखा। धीरे से अंदर। वो चीखी। “आह… अंकित… बड़ा है… धीरे…” मैं रुक गया। फिर धीरे-धीरे पूरा। वो बोली, “अब चोद… मेरी गांड चोद…” मैंने धक्के शुरू किए। वो चीख रही थी। “अंकित… जोर से… फाड़ दो मेरी गांड… आह… बहुत मजा आ रहा है… अपनी चूत सहला रही हूं…” मैं तेज हो गया। वो अपनी चूत में उंगलियां डाल रही थी। हम दोनों झड़ गए।
चौथी रात। भाई बाहर। नेहा ने कहा, “आज मैं ऊपर।” वो मेरे ऊपर चढ़ गई। उसकी चूत मेरे लंड पर। वो कमर हिला रही थी। ऊपर-नीचे। उसके स्तन मेरे मुंह में। मैं चूस रहा था। वो चीख रही थी। “अंकित… तेरे लंड ने मुझे पागल कर दिया… आह… गहरा… और गहरा…” मैंने नीचे से धक्के मारे। वो तेज हो गई। “अंकित… मैं झड़ रही हूं… आह…” वो झड़ गई। मैंने उसे पलटा। डॉगी में। गांड पकड़ी। लंड डाला। तेज-तेज। वो तकिए में मुंह दबाकर चीख रही थी। “अंकित… चोद… मेरी चूत और गांड दोनों तेरी… फाड़ दो… जोर से… मुझे तेरी रंडी बना दे…” हम कई बार झड़े। रात भर चुदाई। सुबह थककर लेटे। नेहा बोली, “अंकित… तू मेरी जान है। रोहित के साथ भी अच्छा है, लेकिन तेरे साथ कुछ और है।”
समय बीतता गया। नेहा मेरी जान बन गई। भाई को शक नहीं। हमारा राज छिपा रहा। लेकिन हर पल वो आग जलती। नेहा की चूत में मेरा लंड, उसके होंठों पर मेरी जीभ, उसके स्तनों में मेरी उंगलियां। गुरुग्राम की इन ऊंची दीवारों के बीच हमारा गुप्त संसार था। जहां बाहर सब सामान्य, अंदर हम जलते रहे – चाहत में, प्यार में, और उस गहरे बंधन में जो शायद कभी टूटे नहीं।
