Sex story Free Gangbang Chudai Kahani – संस्कारी औरत से रंडी बनने की कहानी
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Free Gangbang Chudai Kahani
नमस्ते, मेरा नाम धैर्या है और आज मैं आपको अपनी वो कहानी सुनाने जा रही हूँ जो मैंने कभी किसी से नहीं कही, जो मेरे अंदर सालों से दबी हुई थी और अब बाहर आने को बेकरार है। मेरी उम्र चौबीस साल है, लेकिन जब मैं आईने में खुद को देखती हूँ तो लगता है कि मेरी आँखों में अभी भी वो मासूमियत है जो लोगों को धोखा देती है, जबकि अंदर एक आग सुलग रही है जो कभी बुझने का नाम नहीं लेती। Free Gangbang Chudai Kahani
मेरी त्वचा गोरी है, इतनी गोरी कि हल्की सी लाली भी दूर से चमकती है, लंबे काले बाल हमेशा चोटी में बंधे रहते हैं और जब हवा चलती है तो वे मेरी पीठ पर सरसराते हैं, मेरी बड़ी काली आँखें हैं जिनमें लोग हमेशा संस्कार देखते हैं लेकिन मुझे पता है कि उनमें एक छिपी हुई ललचाहट भी है जो कभी कभी खुद मुझे डराती है, और मेरे होंठ गुलाबी हैं, नरम हैं, जैसे किसी ने उन्हें चूमने के लिए ही बनाया हो।
मेरी बॉडी भी वैसी ही है जो बाहर से संस्कारी लगती है लेकिन अंदर से हर वक्त कुछ मांगती रहती है—भरे हुए स्तन जो ब्लाउज में कैद रहते हैं और हर साँस के साथ हल्के से हिलते हैं, उनकी नरमी मुझे खुद महसूस होती है जब मैं अकेले में उन्हें छूती हूँ, पतली कमर जो साड़ी में लिपटकर और मोहक लगती है, और गोल गोल हिप्स जो चलते वक्त लय पैदा करती हैं, उनकी हल्की हलचल मेरे खुद के कदमों में भी एक अजीब सी गर्मी जगाती है।
मैं सालों तक खुद को यही समझाती रही कि मैं सिर्फ एक संस्कारी लड़की हूँ, अच्छी बेटी, अच्छी बहू, अच्छी पत्नी, लेकिन अंदर की ये भूख मुझे चैन नहीं लेने देती थी। कॉलेज के दिन वो थे जब मेरे अंदर की ये आग सबसे पहले भड़की थी, और आज भी जब मैं उन्हें याद करती हूँ तो मेरी चूत में एक पुरानी सिहरन दौड़ जाती है, जैसे कोई पुरानी खुशबू फिर नाक में घुस आई हो।
छोटे शहर के लड़कियों के कॉलेज में मैं हमेशा किताबों में मुंह छिपाए रहती थी, लाइब्रेरी की आखिरी पंक्ति में बैठकर पढ़ाई करती थी, लेकिन मेरी नजरें बार बार खिड़की से बाहर चली जाती थीं जहाँ मनीष खड़ा होता था—वो सीनियर लड़का जिसका लंबा कद मुझे छोटा महसूस कराता था, चौड़े कंधे जो मजबूती की मिसाल लगते थे.
मस्कुलर बाजूएँ जो टी-शर्ट से बाहर झांकती थीं और उनकी नसें उभरी हुई दिखती थीं, और उसकी दबंग मुस्कान जो मुझे अंदर तक कंपकंपा देती थी, जैसे वो मुस्कान सिर्फ मेरे लिए हो और कह रही हो कि वो मुझे कभी भी दबोच सकता है। उसकी जोरदार हँसी पूरी कैंटीन में गूंजती थी, और वो आवाज मेरे कानों में घंटों तक बजती रहती थी, मेरी छाती में एक अजीब सी धड़कन पैदा करती थी, मेरे निप्पल्स हल्के से सख्त हो जाते थे।
उसके साथ हमेशा चार-पांच दबंग लड़के रहते थे, उनकी मर्दाना खुशबू हवा में फैलती थी, तेज और गर्म, जो मेरी नाक में घुसकर मुझे बेचैन कर देती थी, मेरी चूत में एक हल्की सी नमी पैदा कर देती थी। मैं दूर से देखती रहती थी कि कैसे वो किसी लड़की की कमर पर हाथ रखता था, हल्के से दबाता था, उँगलियाँ त्वचा पर फिसलती थीं, और लड़की शर्मा कर मुस्कुरा देती थी, उसकी साँसें तेज हो जाती थीं।
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मेरी अपनी साँसें तेज हो जाती थीं, छाती ऊपर नीचे होने लगती थी, निप्पल्स सख्त होकर ब्लाउज की कपड़े में चुभने लगते थे, जैसे वे किसी मजबूत स्पर्श की मांग कर रहे हों, और नीचे मेरी चूत में एक गर्म गीलापन फैल जाता था जो पैंटी को भिगो देता था, चिपचिपा और गर्म जो मेरी जाँघों पर फैलता था, मुझे कुर्सी पर हिलने डुलने पर मजबूर कर देता था।
मैं किताब में मुंह छिपा लेती थी, लेकिन मन में बड़बड़ाती रहती थी, “ये क्या हो रहा है मुझे, इतनी भूख क्यों जाग रही है, मेरी चूत तो फट जाएगी इतनी गर्मी से, लेकिन मैं तो संस्कारी हूँ, ये सब गलत है।” एक दिन लाइब्रेरी में मनीष ने अपनी जैकेट कुर्सी पर छोड़ दी थी, और मैं अकेली थी।
मैंने चुपके से उस जैकेट को सूंघा, उसकी मर्दाना पसीने और इत्र की मिश्रित खुशबू मेरी नाक में घुसी, और मेरी चूत एकदम से सिकुड़ गई, रस टपकने लगा। मैं शर्मा गई, लेकिन उस दिन से मुझे मर्दों की खुशबू की लत लग गई। रात को हॉस्टल में जब सब सो जाते थे, मैं बिस्तर पर लेटी रहती थी, लाइट बंद होती थी, सिर्फ मेरी तेज साँसें सुनाई देती थीं और बाहर की हवा की सरसराहट जो मेरे बालों को सहलाती थी, मेरी त्वचा को छूती थी, जैसे कोई अदृश्य हाथ हो।
पहली बार तो मैं सिर्फ जाँघों पर हाथ फेरती रही, भीतर की गर्मी को महसूस करती रही, फिर धीरे धीरे सलवार की डोरी खोली, कपड़ा नीचे सरकाया ताकि ठंडी हवा मेरी गीली पैंटी पर लगे और सिहरन पैदा करे। मैं जानबूझकर चूत को नहीं छूती थी पहले, बस उसके ऊपर उँगलियाँ घुमाती, दाने को हल्के से दबाती, फिर पीछे हट जाती—जैसे मनीष मुझे तड़पा रहा हो, जैसे वो कह रहा हो “अभी नहीं, और इंतजार कर।”
जब बर्दाश्त नहीं होता था तब एक उंगली अंदर डालती, चूत की दीवारें सिकुड़तीं, रस की चिपचिपी आवाज आती, फिर दूसरी उंगली, और मैं कल्पना करती कि मनीष का मोटा लौड़ा है जो मुझे भर रहा है। “आह… मनीष… और जोर से… फाड़ दो मेरी चूत को…” मैं मन में चीखती, कूल्हे ऊपर उठाती, लेकिन जानबूझकर रुक जाती.
फिर शुरू करती—तीन चार बार ऐसा करती ताकि झड़ना देर से हो, और जब आखिर में लहर आती तो पूरे बदन में बिजली दौड़ती, मेरी पीठ बिस्तर पर दब जाती, “उईईई… आह्ह्ह… ह्ह्ह्ह… मनीष… भर दो मुझे…” सिसकारियाँ तकिए में दब जातीं, रस इतना बहता कि चादर गीली हो जाती, और मैं पसीने से तर बतर होकर लेटी रहती.
अपराधबोध से रोने लगती, “भगवान जी माफ करना, मैं कितनी गंदी हूँ,” लेकिन मेरी चूत अभी भी फड़क रही होती थी, जैसे कह रही हो कि और चाहिए। लेकिन अगली रात फिर वही होता। एक रात मैंने इतना तड़पाया खुद को कि तीन बार झड़ी, हर बार और जोर से, और हर बार मनीष की कल्पना में वो मुझे अपनी गोद में भरकर कह रहा था “तेरी चूत मेरी है अब।”
एक बार तो मैंने डायरी में लिखा था—मैंने एक गुप्त डायरी रखनी शुरू कर दी थी जिसमें मैं अपनी सारी गंदी कल्पनाएँ लिखती थी—“मनीष ने मुझे लाइब्रेरी में दीवार से सटाया, मेरी साड़ी ऊपर की, मोटा लौड़ा मेरी चूत में घुसाया, और इतना जोर से ठोका कि मैं चीख पड़ी, उसका रस मेरे अंदर भर दिया, मेरी कोख गरम हो गई…” लिखते वक्त ही मेरी चूत फिर गीली हो जाती थी।
ग्रेजुएशन के बाद घरवालों ने शादी करवा दी, और मुझे लगा कि शायद अब ये सब खत्म हो जाएगा, कि एक पति मिलेगा जो मेरी भूख मिटा देगा। श्वेतांक से मिली, वो अच्छा लड़का था, शांत, सुरक्षित, अच्छी नौकरी, लेकिन उसमें वो दबंगपन नहीं था जो मुझे अंदर तक हिलाता, उसकी खुशबू भी साधारण थी, कोई मर्दाना तेजी नहीं।
सुहागरात को मैं बहुत घबरा रही थी, लाल साड़ी में घूंघट निकाले बैठी थी, साँसें तेज चल रही थीं, हाथ पसीने से गीले हो गए थे, हथेलियाँ चिपचिपी लग रही थीं, चूत में एक अजीब सी उम्मीद थी। श्वेतांक ने लाइट बंद की, मुझे बाहों में लिया, लेकिन उसका स्पर्श हल्का था, चुंबन बस होंठों पर स्पर्श मात्र, कोई गहराई नहीं, कोई जीभ का खेल नहीं जो मेरी कल्पनाओं में था।
मैंने कोशिश की, उसकी जीभ चाटी, लेकिन वो हट गया। ब्लाउज खोला, ब्रा के ऊपर से स्तनों को छुआ, लेकिन कोई जोर नहीं, कोई भूख नहीं। मेरी निप्पल्स सख्त हो रही थीं, चूत में गर्मी फैल रही थी जो जाँघों तक पहुँच रही थी, मैंने उसका हाथ नीचे ले जाने की कोशिश की, लेकिन वो जल्दी में था, साड़ी ऊपर की, पैंटी साइड की और घुस गया. ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
उसका लौड़ा गर्म था लेकिन पतला, कोई भराव नहीं। दर्द हुआ, “आह… धीरे… थोड़ा और…” मैंने कहा, मैंने उसके कूल्हों को पकड़ा, जोर से दबाने को कहा, लेकिन वो चार-पांच मिनट में ही झड़ गया, उसका रस मेरी चूत में गिरा, और मैं अधूरी रह गई, चूत अभी भी फड़क रही थी, गीली और भूखी, जैसे कह रही हो “और चाहिए, मोटा चाहिए, जोरदार चाहिए।”
मैंने खुद को समझाया कि यही सामान्य है, अच्छी पत्नियाँ ज्यादा नहीं मांगतीं, लेकिन मेरी त्वचा अभी भी गर्म थी, साँसें तेज थीं, और मैं बाथरूम में जाकर उँगलियाँ डालकर खुद को तड़पाती रही। शादी को दो साल हो गए, और हर शनिवार रात वही रूटीन—लाइट बंद, हल्का किस, जल्दी घुसना, जल्दी खत्म, जो मुझे और भूखा छोड़ देता था।
एक रात मैंने ज्यादा कोशिश की, उसकी कमीज उतारी, छाती पर हाथ फेरे, निप्पल्स चाटे, जीभ से किस किया, उसका नमकीन स्वाद महसूस किया, नीचे हाथ ले गई, लेकिन वो असहज हो गया, “अरे ये क्या कर रही हो, अच्छी बहुएँ ऐसा नहीं करतीं, बस लेट जाओ।” मेरी भूख फिर दब गई, वो झड़ गया, और मैं बाथरूम में जाकर खुद को छूने लगी.
तीन उँगलियाँ अंदर डालकर, दाने को रगड़कर, “आह्ह… कोई तो जोर से ठोके… मेरी चूत फाड़ दे…” सिसकारियाँ निकलती रहीं, पसीना बहता रहा, लेकिन पूरा मजा नहीं आया, मैं रोने लगी, और फिर मंदिर में जाकर प्रार्थना की, “भगवान जी माफ करना,” लेकिन प्रार्थना करते वक्त भी मन में एक दबंग मर्द की कल्पना आ गई जो मुझे दबोच रहा था।
फिर मैंने नौकरी ढूंढी, बोरियत और अकेलापन दूर करने के लिए, जैसे कुछ नया चाहिए था जो मेरी इस भूख को शांत करे या और भड़काए। रणविजय की कंपनी में साक्षात्कार मिला, वहाँ जाकर पहली बार किसी मर्द की नजरों से सिहर उठी। रणविजय—लंबा, चौड़े कंधे, ट्रिम्ड दाढ़ी, गहरी आँखें जो मेरे अंदर तक देख रही थीं.
और वो मर्दाना इत्र की खुशबू जो मुझे मदहोश कर गई, तेज और गर्म जो मेरी नाक में घुसकर सीधे चूत तक पहुँचती थी, मेरी पैंटी एकदम गीली हो गई। साक्षात्कार में उसकी नजरें मेरे पल्लू पर रुकीं, स्तनों के उभार पर, और मुझे लगा जैसे नजरों से ही चूत में उंगली घुसेड़ रहा हो, तेज सिहरन दौड़ गई, गीलापन फैल गया।
“आपकी आँखें बहुत ईमानदार हैं धैर्या जी, लेकिन उनमें कुछ और भी छिपा है ना… थोड़ा खुल के बताओ ना क्या चाहती हो,” उसने कहा, आवाज में छेड़ने वाली लय थी। हाथ मिलाते वक्त उसकी उंगली मेरी हथेली पर जानबूझकर ब्रश हुई, गर्म और मजबूत, मेरी त्वचा में बिजली सी दौड़ गई, साँसें रुक सी गईं।
घर लौटकर रात को श्वेतांक के साथ फिर वही हुआ, लेकिन मेरा दिमाग रणविजय में था, उसकी खुशबू अभी भी नाक में बसी थी, उसकी उंगली का स्पर्श हाथ पर महसूस हो रहा था। मैं ज्यादा उत्साह दिखा रही थी, उससे जोर से ठुकवाने की कोशिश की, लेकिन वो जल्दी खत्म हो गया।
मैं बिस्तर पर लेटी रणविजय की खुशबू और स्पर्श याद करती रही, चुपके से उँगलियाँ चूत में डालकर रगड़ती रही, “रणविजय सर… आपका लौड़ा… अंदर…” मन में बड़बड़ाती रही। अगले दिन ऑफिस का पहला दिन था। मैंने हल्की लिपस्टिक लगाई जो होंठों को और गुलाबी बना रही थी, पल्लू थोड़ा ढीला रखा जो स्तनों के उभार को हल्का दिखाता था।
लिफ्ट में किशोर के पीछे खड़ी थी, उसकी मर्दाना खुशबू फिर नाक में घुसी, उसकी पीठ मेरी छाती से हल्की छू गई, मेरे निप्पल्स सख्त हो गए। ऑफिस में सबकी नजरें मेरी कमर और स्तनों पर रुकती थीं, और मुझे एक अजीब रोमांच होता था जो पूरे बदन में फैल जाता था। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
रणविजय ने मुझे पास बुलाया, काम समझाने लगा, उसकी खुशबू फिर नाक में घुसी, उसका हाथ मेरे हाथ को छूता रहा, गर्म और मजबूत, कभी फाइल देते वक्त उँगलियाँ मेरी उँगलियों पर रुक जातीं। मेरी साँसें तेज हो गईं, चूत फिर गीली होने लगी, जैसे अब ये आग बुझने के बजाय और भड़क रही हो, और मुझे पता था कि अब इसे रोकना मुश्किल है।
शाम को घर लौटकर आईने में खुद को देखा, आँखों में एक नई चमक थी, त्वचा पर हल्का पसीना, चूत अभी भी फड़क रही थी। मैंने खुद से कहा, “मैं तो संस्कारी हूँ ना?” लेकिन अंदर की आग अब तेजी से सुलगने लगी थी, और मुझे पता था कि इसे बुझाना आसान नहीं होगा, बल्कि अब ये भड़कने वाली है।
अगली सुबह मैं जल्दी उठ गई, दिल में एक अजीब सी उत्तेजना थी जो रात भर सोने नहीं दी थी। मैंने नहाने के लिए गुनगुना पानी चलाया, और जैसे ही पानी मेरी त्वचा पर गिरा, कल की यादें फिर ताजा हो गईं—रणविजय की वो गहरी नजरें, उसकी उंगली का स्पर्श, उसकी मर्दाना खुशबू जो अभी भी मेरी नाक में बसी हुई लग रही थी।
मैंने साबुन हाथ में लिया, स्तनों पर फेरा, निप्पल्स फिर सख्त हो गए, और हाथ अपने आप नीचे चला गया। मैंने उँगलियाँ चूत पर रगड़ीं, लेकिन रुक गई—आज ऑफिस जाना था, और मुझे लगा कि ये आग वहाँ और भड़केगी। मैंने खुद को रोका, लेकिन चूत पूरे समय गीली रही, जैसे कोई इंतजार कर रही हो।
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तैयार होते वक्त मैंने आज थोड़ी और सावधानी बरती। गुलाबी साड़ी चुनी जो मेरी गोरी त्वचा पर और चमकती थी, ब्लाउज टाइट था जो स्तनों को अच्छे से पकड़ता था, और पल्लू मैंने जानबूझकर थोड़ा ढीला रखा ताकि कमर का उभार हल्का सा दिखे।
लिपस्टिक लगाई, गहरी लाल जो होंठों को और भरे हुए दिखाती थी, और खुद से आईने में मुस्कुराई—मैं जानती थी कि आज कुछ अलग होने वाला है। घर से निकलते वक्त श्वेतांक ने मुझे देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं, बस बोला “जल्दी आना।” मुझे लगा कि वो मेरी आँखों की चमक नहीं देख पाया।
ऑफिस पहुँचते ही हवा में वो मर्दाना माहौल फिर महसूस हुआ। सबकी नजरें मुझ पर टिक रही थीं, कोई मुस्कुराता, कोई आँख मारता, और मेरी चूत हर नजर से सिकुड़ जाती। किशोर ने कॉफी देते वक्त मेरे हाथ को छुआ, उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों पर रुक गईं, गर्माहट फैल गई, और मैं शर्मा कर मुस्कुरा दी।
कबीर ने लिफ्ट में मेरे पीछे खड़े होकर कहा, “भाभी जी, आज तो बहुत सुंदर लग रही हैं,” उसकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी, और मैंने सिर्फ सिर झुका लिया, लेकिन भीतर से एक लहर दौड़ गई। रणविजय ने मुझे सुबह ही अपने केबिन में बुलाया। दरवाजा बंद किया, और पास बैठने को कहा।
उसकी खुशबू फिर कमरे में फैल गई, इतनी तेज कि मेरी साँसें खुद बे खुद तेज हो गईं। वो फाइलें दिखाने लगा, लेकिन उसका हाथ बार बार मेरे हाथ से टकराता, कभी कंधे पर रुक जाता। “धैर्या जी, कल रात अच्छी नींद आई?” उसने पूछा, आँखों में वो ही छिपी मुस्कान। “Free Gangbang Chudai Kahani”
मैं लाल हो गई, “जी सर… हाँ,” लेकिन मेरी आवाज काँप गई। वो और करीब आया, उसकी दाढ़ी का खरापन मेरी कल्पना में फिर चुभने लगा। उसने मेरी साड़ी की चुन्नट ठीक करने के बहाने कंधे को छुआ, उँगलियाँ हल्के से दबाईं, और मेरी त्वचा में आग लग गई। “आप बहुत मेहनती हैं, लेकिन थोड़ा आराम भी कर लिया करो,” उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज में कुछ और था, जैसे वो मेरी भीतर की आग को भाँप रहा हो।
मैं सिर्फ सिर हिलाती रही, लेकिन चूत इतनी गीली हो चुकी थी कि पैंटी चिपक गई थी। दोपहर में लंच के वक्त रणविजय ने मुझे अपनी गाड़ी में बिठाया, बोला “चलो बाहर खाते हैं, ऑफिस का खाना अच्छा नहीं।” मैं मना नहीं कर पाई। गाड़ी में अकेले, उसकी खुशबू पूरे केबिन में फैली हुई थी, उसका हाथ गियर पर था और मेरी जाँघ के इतना करीब कि हल्की सी हलचल से छू जाता।
वो बातें करने लगा, मेरी शादी के बारे में, श्वेतांक के बारे में, “आपका पति बहुत खुशकिस्मत है जो आपको पाया,” उसने कहा, लेकिन उसकी नजरें मेरी कमर पर रुक रही थीं। मैं शर्मा गई, लेकिन भीतर से एक रोमांच था। रेस्टोरेंट में उसने मेरे लिए कुर्सी खींची, मेरे कंधे को छुआ, और जब खाना परोसा तो मेरे प्लेट में खुद डाला। “Free Gangbang Chudai Kahani”
उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से टकराईं, और मैं काँप गई। लंच के बाद गाड़ी में वापस, उसने मेरे बालों की तारीफ की, “इतने लंबे बाल, इन्हें खोलकर देखने चाहिए कभी।” मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन मन में कल्पना करने लगी कि वो मेरे बाल पकड़कर मुझे अपनी तरफ खींचता है। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
शाम को लेट वर्किंग हुई। सब चले गए, सिर्फ मैं और रणविजय केबिन में। लाइट कम थी, बाहर बारिश हो रही थी, और उसकी बूंदों की आवाज खिड़की पर पड़ रही थी। रणविजय मेरे बहुत करीब बैठा था, फाइलें दिखाते वक्त उसकी साँसें मेरी गर्दन पर लग रही थीं, गर्म और भारी।
“धैर्या, तुम्हारी आँखें कुछ और कहती हैं,” उसने फुसफुसाया, उसकी आवाज इतनी गहरी कि मेरी चूत सिकुड़ गई। मैंने सिर झुका लिया, लेकिन हिलाया नहीं। उसका हाथ मेरी पीठ पर फिसला, हल्के से दबाया, और मेरी साड़ी की चुन्नट सरक गई। मैं काँप रही थी, लेकिन रुकी नहीं।
“तुम बहुत संस्कारी हो, लेकिन भीतर कुछ और जल रहा है ना?” उसने कहा, और उसकी उँगलियाँ मेरी कमर पर रुक गईं। मैंने सिर्फ सिसकारी ली, “सर…” लेकिन वो आवाज इतनी कमजोर थी कि जैसे हाँ कह रही हो। घर लौटकर मैं बिस्तर पर लेट गई, श्वेतांक सो रहा था।
मैंने चुपके से हाथ साड़ी के अंदर डाला, चूत इतनी गीली थी कि उँगलियाँ फिसल गईं। मैंने तीन उँगलियाँ अंदर डालीं, जोर जोर से रगड़ा, रणविजय की आवाज याद करती रही, “आह्ह… सर… छुओ मुझे… और जोर से…” मैंने खुद को इतना तड़पाया कि दो बार झड़ी, रस बहकर चादर भिगो दी, लेकिन संतुष्टि नहीं हुई।
मैं रोने लगी, लेकिन ये रोना अब अपराधबोध का नहीं, अधूरी भूख का था। अगले कुछ दिन ऐसे ही बीते—हर दिन रणविजय का स्पर्श बढ़ता गया, कभी हाथ, कभी कंधा, कभी कमर। ऑफिस के बाकी मर्द भी खुलने लगे, कोई पीठ पर हाथ फेरता, कोई मजाक में कमर पकड़ता। “Free Gangbang Chudai Kahani”
मैं विरोध नहीं करती थी, बल्कि भीतर से और चाहती थी। घर पर श्वेतांक के साथ रातें और निराशाजनक हो गईं—मैं ऊपर आने की कोशिश करती, लेकिन वो मना कर देता, “ऐसा मत करो, शर्म की बात है।” मैं बाथरूम में जाकर खुद को संतुष्ट करती, लेकिन अब सिर्फ उँगलियाँ काफी नहीं लगती थीं।
एक शाम रणविजय ने कहा, “धैर्या, अगले हफ्ते एक बिजनेस ट्रिप है, तुम मेरे साथ चलोगी।” मैंने हिचकिचाया, लेकिन आँखें चमक गईं। श्वेतांक से पूछा तो उसने कहा, “जाओ, करियर के लिए अच्छा है।” मैंने हाँ कह दी, लेकिन दिल जानता था कि ये ट्रिप मेरी जिंदगी बदल देगी।
ट्रिप के लिए सामान पैक करते वक्त मेरे हाथ काँप रहे थे, दिल में एक अजीब सी घबराहट और उत्साह दोनों थे, जैसे कोई नई जिम्मेदारी मिलने वाली हो। मैंने साड़ियाँ चुनीं जो आरामदायक थीं, सादे रंग की, ब्लाउज ढीले, और सोचा कि बिजनेस ट्रिप है तो प्रोफेशनल ही रहना चाहिए।
मैं खुद को बार बार समझाती रही कि ये सिर्फ काम की यात्रा है, मीटिंग्स हैं, क्लाइंट्स से मिलना है, कुछ और नहीं। रात को श्वेतांक सो गया, और मैं बिस्तर पर लेटी ऑफिस की यादें ताजा करती रही—रणविजय की नजरें, उसकी मुस्कान, उसकी खुशबू। मेरी चूत में हल्की सी गर्मी थी, लेकिन मैंने हाथ नहीं डाला, खुद को रोका, सोचा कि संस्कारी लड़कियाँ ऐसा नहीं सोचतीं। “Free Gangbang Chudai Kahani”
मैंने प्रार्थना की, “भगवान जी, मुझे सही रास्ते पर रखना,” और नींद आ गई। ट्रिप से तीन दिन पहले की शाम थी। ऑफिस में रणविजय ने मुझे केबिन में बुलाया, दरवाजा बंद किया, और पास बैठने को कहा। उसकी खुशबू फिर फैल गई, लेकिन मैंने खुद को संभाला।
वो ट्रिप की डिटेल्स बता रहा था—कहाँ रहना है, कौन से क्लाइंट्स मिलने हैं, क्या क्या तैयार करना है। उसका हाथ फाइल दिखाते वक्त मेरे हाथ से टकराया, लेकिन मैंने झटके से हटा लिया, शर्मा गई। “धैर्या जी, आप थोड़ी नर्वस लग रही हैं,” उसने मुस्कुराकर कहा। मैंने कहा, “जी सर, पहली ट्रिप है ना।”
वो हँसा, “चिंता मत करो, मैं हूँ ना आपके साथ।” मेरी साँसें तेज हो गईं, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा, सिर्फ सिर झुकाया। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा, हल्के से दबाया, “आराम से, सब अच्छा होगा।” उस स्पर्श से मेरी त्वचा में सिहरन दौड़ गई, लेकिन मैंने खुद को समझाया कि ये सिर्फ बॉस का हौसला है। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
अगले दो दिन ऑफिस में व्यस्त बीते। रणविजय अब भी पास बैठता था, लेकिन मैं दूरी बनाए रखती थी। किशोर और कबीर मजाक करते, “भाभी जी, ट्रिप पर मजा करना,” लेकिन मैं हँसकर टाल देती। घर पर श्वेतांक के साथ रातें सामान्य थीं—वो मुझे गले लगाता, हल्का किस करता, और जल्दी सो जाता।
मैं कोशिश करती कि ज्यादा देर चले, लेकिन वो थक जाता। हर रात मैं बाथरूम में जाकर खुद को देखती, सोचती कि मेरी बॉडी में ये गर्मी क्यों है, लेकिन हाथ नहीं डालती थी, अपराधबोध से डरती थी। ट्रिप से एक रात पहले रणविजय ने मुझे देर रात केबिन में बुलाया। “Free Gangbang Chudai Kahani”
मस्तराम की गन्दी चुदाई की कहानी : डॉकटराइन मरीज से क्लिनिक में चुदवाने लगी
बाहर बारिश हो रही थी, बिजली कड़क रही थी, और केबिन में सिर्फ टेबल लैंप की रोशनी थी। मैं अंदर गई, दरवाजा बंद हुआ। रणविजय ने ट्रिप की आखिरी फाइलें दिखाईं, और कहा, “कल सुबह जल्दी निकलना है।” वो मेरे करीब आया, मेरे हाथ पकड़े, और कहा, “धैर्या, तुम बहुत अच्छा काम कर रही हो, मुझे तुम पर गर्व है।”
उसकी आँखें गहरी थीं, लेकिन मैंने कुछ गलत नहीं समझा। उसने मेरे गाल पर हल्के से हाथ फेरा, जैसे बड़ा भाई हो, “सो जाओ, कल लंबा दिन है।” मैं शर्मा गई, लेकिन भीतर से एक अजीब सुकून था। घर लौटकर मैंने श्वेतांक को गले लगाया, और सोचा कि ट्रिप अच्छी रहेगी, करियर के लिए जरूरी है। पूरी रात मैंने सपने में मीटिंग्स देखीं, क्लाइंट्स से बातें कीं, और रणविजय को बॉस की तरह देखा। “Free Gangbang Chudai Kahani”
सुबह ट्रिप के लिए निकलते वक्त मैंने सादी नीली साड़ी पहनी, ब्लाउज ढीला, और मन में सिर्फ एक विचार था—ये ट्रिप मेरे करियर के लिए अच्छी साबित होगी, कुछ और नहीं। गाड़ी में रणविजय के बगल में बैठी मैं खिड़की से बाहर देख रही थी, बाहर का नजारा बदलता जा रहा था, लेकिन मेरे मन में सिर्फ मीटिंग्स की बातें घूम रही थीं। रणविजय चुपचाप गाड़ी चला रहा था, कभी कभी मेरी तरफ देखकर मुस्कुराता, और मैं शर्मा कर सिर झुका लेती।
होटल पहुँचते ही उसने चेक-इन करवाया, दो अलग कमरे थे, और मैंने राहत की साँस ली। मेरा कमरा उसके कमरे के बगल में था। मैंने सामान रखा, साड़ी ठीक की, और मीटिंग के लिए तैयार हुई। दिन भर क्लाइंट्स से मिलना हुआ, मैं नोट्स लेती रही, रणविजय की तारीफ सुनती रही कि उनकी सेक्रेटरी कितनी मेहनती है।
शाम को मीटिंग खत्म हुई, सब थक गए थे। रणविजय ने कहा, “धैर्या, आज थोड़ा आराम कर लो, रात को डिनर साथ करेंगे।” मैंने हाँ कह दी, सोचा कि प्रोफेशनल डिनर है। अपने कमरे में जाकर मैं नहाई, गुनगुने पानी ने बॉडी को सुकून दिया, लेकिन जब साबुन स्तनों पर फेरा तो निप्पल्स सख्त हो गए, और मुझे लगा कि कुछ गलत है। “Free Gangbang Chudai Kahani”
मैंने खुद को डाँटा, सादी साड़ी पहनी, और डिनर के लिए नीचे लॉबी में पहुँची। रणविजय वहाँ इंतजार कर रहा था, उसने मुझे देखकर मुस्कुराया, और हम रेस्तराँ में गए। खाना खाते वक्त वो मेरी शादी की बातें करने लगा, श्वेतांक के बारे में पूछा, और कहा, “तुम्हारे पति बहुत खुशकिस्मत हैं।”
मैं शर्मा गई, लेकिन भीतर से एक अजीब गर्मी थी। डिनर के बाद वो बोला, “मेरे सुइट में आओ, कुछ जरूरी फाइलें देखनी हैं।” मैंने हिचकिचाया, लेकिन सोचा कि काम है, मना नहीं कर सकती। उसके सुइट में पहुँची तो कमरा बहुत बड़ा था, सोफा, बड़ा बिस्तर, और बालकनी से बाहर का नजारा। “Free Gangbang Chudai Kahani”
उसने दरवाजा बंद किया, शराब की बोतल निकाली, “थोड़ा पी लो, थकान उतरेगी।” मैंने मना किया, “नहीं सर, मैं नहीं पीती।” लेकिन वो हँसा, “एक घूँट, कोई नशा नहीं होगा।” मैंने थोड़ा पी लिया, गला जल गया, लेकिन भीतर एक गर्मी फैल गई। वो पास बैठा, फाइलें दिखाने लगा, लेकिन उसका हाथ मेरी जाँघ पर रख दिया।
मैं चौंकी, “सर…” लेकिन वो रुका नहीं, मेरी कमर पकड़ी, मुझे अपनी तरफ खींचा। “धैर्या, तुम जानती हो मैं तुम्हें कितने दिन से चाहता हूँ,” उसने कहा, और मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए। उसका चुंबन गहरा था, जीभ अंदर डाली, दाढ़ी मेरी त्वचा पर चुभ रही थी, और मैं पिघल गई।
मैंने विरोध करने की कोशिश की, लेकिन मेरी बॉडी ने साथ दिया, मेरी जीभ उसकी जीभ से लड़ने लगी। उसने मेरी साड़ी का पल्लू खींचा, वो नीचे गिर गया, ब्लाउज के बटन खोले, ब्रा ऊपर की, और मेरे स्तनों को मुँह में लिया। निप्पल्स को चूसा, काटा, और मैं सिसक रही थी, “आह्ह… सर… ये गलत है… आह्ह…” लेकिन मेरी आवाज में हाँ थी। “Free Gangbang Chudai Kahani”
उसने मुझे गोद में उठाया, बिस्तर पर लिटाया, साड़ी पूरी उतारी, पैंटी फाड़ दी। मैं नंगी थी उसके सामने, शर्मा रही थी, लेकिन चूत से रस टपक रहा था। वो भी कपड़े उतारने लगा, उसका चौड़ा सीना, मजबूत बाजूएँ, और फिर उसका मोटा लौड़ा बाहर आया—इतना मोटा और लंबा कि मैं डर गई, लेकिन भूख भी लगी। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
वो मेरे ऊपर आया, स्तनों को दबाता रहा, गर्दन चाटता रहा, और नीचे हाथ ले गया। उसकी उँगलियाँ मेरी चूत पर फिरीं, दाने को रगड़ा, दो उँगलियाँ अंदर डालीं, “कितनी गीली हो तुम, कितने दिन से तड़प रही हो ना।” मैं चीख पड़ी, “आह्ह… सर… हाँ… उईई…” मेरी चूत सिकुड़ रही थी, पहली बार किसी मर्द की उँगलियाँ अंदर थीं।
उसने मेरी टाँगें फैलाईं, मुँह नीचे ले गया, जीभ से चूत चाटने लगा, दाने को चूसा, अंदर जीभ डाली। मैं पागल हो गई, कूल्हे ऊपर उठा रही थी, “आह्ह… सर… ओह्ह… मत रुको… आह्ह्ह…” पहली बार किसी ने मुझे चाटा था, और मैं झड़ गई, रस उसके मुँह पर गिरा। वो ऊपर आया, अपना लौड़ा मेरे मुँह के पास लाया, “चूसो इसे।”
मैंने हिचकिचाया, लेकिन उसने सिर पकड़ा, लौड़ा मुँह में डाल दिया। इतना मोटा कि मुँह फट जाएगा लगा, लेकिन मैं चूसने लगी, जीभ फेरी, वो कराह रहा था, “हाँ… ऐसे ही… अच्छी रंडी बन रही हो।” मैंने और जोर से चूसा, गले तक लिया, आँसू आ गए, लेकिन मजा आ रहा था। “Free Gangbang Chudai Kahani”
फिर वो मेरे ऊपर आया, लौड़ा चूत पर रगड़ा, और धीरे धीरे अंदर घुसाया। दर्द हुआ, “आह्ह… सर… धीरे… फट जाएगी…” लेकिन वो रुका नहीं, पूरा अंदर डाल दिया। मेरी चूत भर गई, पहली बार ऐसा लगा कि संतुष्टि मिल रही है। वो ठोकने लगा, जोर जोर से, बिस्तर हिल रहा था, मेरे स्तन उछल रहे थे, “आह्ह… हाँ सर… और जोर से… फाड़ दो मुझे…” मैं चीख रही थी, कूल्हे ऊपर उठा रही थी।
वो अलग अलग तरीकों से ठोका, मुझे घोड़ी बनाया, पीछे से घुसाया, बाल पकड़कर खींचा। मैं तीन बार झड़ी, हर बार जोर से चीखी, रस बहता रहा। आखिर में वो मेरे अंदर झड़ा, गर्म रस कोख में भर दिया, और मैं सुकून से भर गई। हम नंगे लेटे रहे, वो मुझे गले लगाए, स्तनों को सहलाता रहा।
मैं रोने लगी, लेकिन खुशी के आँसू थे। “सर… ये सब… मैंने कभी सोचा नहीं था,” मैंने कहा। वो मुस्कुराया, “अब तुम मेरी हो, और ये सिर्फ शुरुआत है।” मैंने सिर उसके सीने पर रख दिया, और सोचा कि अब वापस पुरानी धैर्या नहीं लौट सकती। सुबह की पहली किरण बालकनी से अंदर आई तो रणविजय ने मुझे बालों से जोर से पकड़कर खींचा.
उसकी मजबूत उँगलियाँ मेरी खोपड़ी में गहरे चुभ रही थीं, एक मीठा जलन भरा दर्द सिर से गर्दन तक फैल रहा था, उसकी गरम साँसें मेरी कान की लौ पर लग रही थीं, उसकी मर्दाना खुशबू—रात के पसीने, रस और इत्र की मिश्रित तेज, नमकीन गंध—मेरी नाक में घुसकर सीधे चूत तक पहुँच रही थी, मेरी त्वचा पर एक कंपकंपी दौड़ गई, चूत की दीवारें सिकुड़ने लगीं, रस की पहली बूंद पैंटी में सोख ली। “Free Gangbang Chudai Kahani”
“उठ मेरी संस्कारी बहू, आज तेरे सारे संस्कार उतार दूँगा, तुझे अपनी सस्ती रंडी बनाकर पूरा दिन नचाऊँगा, बोल… तैयार है ना अपनी इज्जत लुटवाने को, अपनी कोख मेरे रस से भरवाने को?” उसकी आवाज में वो दबंग गरज थी जो मेरी रीढ़ की हड्डी में बिजली दौड़ा देती थी, मेरे कानों में गूंज रही थी।
मैं सिहर उठी, चूत में तुरंत रस की गर्म लहर फैल गई, पैंटी एकदम तर हो गई, लेकिन अपराधबोध की एक ठंडी लहर भी दिल पर लगी, फिर भी मैंने काँपती, भीगी आवाज में कहा, “हाँ सर… तैयार हूँ… आपकी सस्ती रंडी बनने को… मेरी इज्जत लूट लो।”
वो क्रूरता से हँसा, हँसी की आवाज कमरे में गूंजी, मुझे घुटनों पर धकेला, अपना मोटा लौड़ा मेरे चेहरे पर दे मारा, उसकी गर्माहट, नसों की उभरी नसें, चमड़ी की नरम खुरदराहट मेरी गाल और होंठों पर रगड़ रही थी, उसकी नमकीन, मर्दाना गंध नाक में भर गई। “चूस इसे, सुबह सुबह अपनी संस्कारी बहू का मुँह गरम कर, पूरा गले में ले,” उसने हुक्म दिया, बाल पकड़कर सिर दबाया। “Free Gangbang Chudai Kahani”
मैंने मुँह खोला, लौड़ा अंदर लिया, ग्ग्ग्ग… ग्ग्ग्ग… गों गों… की गीली, चिपचिपी आवाजें आने लगीं, उसका नमकीन, गाढ़ा स्वाद जीभ पर फैल रहा था, थूक बह रही थी, गला भर गया, वो मेरे सिर को पकड़कर जोर जोर से धक्के मार रहा था, गले तक घुसेड़ रहा था, मेरी थूक और उसके रस की मिश्रित गंध कमरे में फैल रही थी। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
“गहरा ले साली… हाँ… मेरी गुलाम रंडी… पूरा निगल… देख कितनी अच्छी संस्कारी बहू मुँह चुदवा रही है, तेरे पति को पता चले तो क्या कहेगा?” वो ताना मार रहा था, उसकी आवाज में अपमान की मिठास थी। मैं और जोर से चूस रही थी, गला दर्द कर रहा था, जलन हो रही थी, आँसू बह रहे थे, नाक से साँस ले रही थी, लेकिन चूत में आग भड़क रही थी, रस जाँघों पर बहने लगा।
जब वो झड़ने लगा तो सिर दबाकर मुँह में ही झड़ गया, गर्म, गाढ़ा, चिपचिपा रस गले में उतरा, उसकी नमकीन कड़वाहट जीभ पर रह गई, “निगल सब… एक बूंद नहीं गिरनी चाहिए, बोल धन्यवाद मेरी रंडी,” उसने कहा। मैंने सब निगल लिया, गले में जलन और गर्मी फैल गई, और काँपती आवाज में कहा, “धन्यवाद सर… आपके रस के लिए… आपकी रंडी को खिलाने के लिए।”
वो संतुष्ट होकर मुस्कुराया, मेरे गाल पर थप्पड़ मारा, हल्का लेकिन अपमानजनक, त्वचा पर जलन और गर्मी फैल गई। नहाने का हुक्म दिया। बाथरूम में गुनगुना पानी चल रहा था, भाप कमरे में फैल रही थी, शीशे पर धुंध जम गई थी, वो मुझे शीशे के सामने दीवार से सटाकर खड़ा कर दिया, मेरे हाथ ऊपर उठवाए, मेरी कलाइयाँ उसकी पकड़ में दर्द कर रही थीं, और खुद साबुन से मेरी बॉडी मलने लगा।
उसकी मजबूत हथेलियाँ मेरे स्तनों पर फिरीं, जोर से मसलीं, निप्पल्स को मरोड़ा, इतना जोर कि दर्द की लहर सीने से पेट तक गई, लेकिन निप्पल्स और सख्त हो गए, मीठी जलन फैल गई। उसने मंगलसूत्र पकड़ा, लौड़े से लिपटवाया, धातु की ठंडक और लौड़े की गर्मी दोनों मेरी छाती पर लग रही थीं, “ये तेरी शादी की निशानी है ना साली, अब मेरे लौड़े से लिपटकर रहेगी, तेरे पति की जगह मैं लूँगा,” उसने ताना मारा। “Free Gangbang Chudai Kahani”
फिर नीचे हाथ ले गया, चूत में तीन उँगलियाँ एक साथ घुसेड़ीं, जोर से अंदर बाहर करने लगा, रस की चिपचिपी, गीली आवाज पानी की आवाज में मिल रही थी, मेरी चूत की दीवारें उसकी उँगलियों से रगड़ खा रही थीं, जलन और मजा दोनों। मैं शीशे में अपनी सूरत देख रही थी—लाल चेहरा, आँसू, होंठ कटे हुए, आँखें भूखी और शर्म से भरी।
“देख अपनी सूरत, कितनी रंडी लग रही है, आँखें बंद मत करना, अपनी इज्जत टूटते देख,” उसने हुक्म दिया। मैं देखती रही, अपराधबोध और हवस लड़ रहे थे, मेरी साँसें भाप में मिल रही थीं, “सर… शर्म आ रही है… मेरी इज्जत… लेकिन और करो… और जोर से…” वो हँसा, “दर्द चाहिए मेरी रंडी को, तभी मजा आएगा।”
उसने मुझे घुटनों पर बिठाया, लौड़ा फिर मुँह में डाला, पानी मेरे बदन पर गिर रहा था, गरमाहट और ठंडक दोनों त्वचा पर खेल रही थीं, वो मेरे बाल पकड़कर मुँह की ठुकाई कर रहा था। “देख… कितनी अच्छी संस्कारी बहू मुँह चुदवा रही है, बोल धन्यवाद,” वो कह रहा था।
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मैं ग्ग्ग्ग… गों… करती चूसती रही, उसकी गंध, स्वाद, गर्मी सब कुछ महसूस कर रही थी, जब तक वो फिर मुँह में नहीं झड़ गया, रस निगलवाया, और कहा, “अब बोल… मैं आपकी सस्ती रंडी हूँ और मेरी इज्जत आपकी है।” मैंने कहा, “मैं आपकी सस्ती रंडी हूँ सर… मेरी इज्जत आपकी है।”
नाश्ता रूम सर्विस से आया, लेकिन खाने से पहले उसने मुझे टेबल पर झुकाया, साड़ी ऊपर की, गांड पर जोरदार चाँटा मारा, त्वचा में जलन फैल गई, लाल निशान पड़ गया, हवा लगते ही और दर्द हुआ। “खाना बाद में, पहले मेरी रंडी की गांड लाल करूँ,” उसने कहा, और चाँटे मारने शुरू किए, हर चाँटे की आवाज कमरे में गूंजती, मेरी त्वचा पर आग सी लगती, लालिमा फैलती।
हर चाँटे पर मैं चीखती, “आह्ह… सर…” वो रुकता, “धन्यवाद बोल हर चाँटे के बाद, मेरी गुलाम, और माँग अगला।” मैं रोते हुए कहती, “धन्यवाद सर… और मारो… अपनी रंडी की गांड लाल करो…” दस चाँटे मारकर रुका, गांड जल रही थी, छूने पर भी दर्द, फिर पीछे से लौड़ा घुसेड़ दिया। फच फच फच… की गीली आवाजें पूरे कमरे में गूंज रही थीं. ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
मेरे स्तन टेबल पर दब रहे थे, ठंडी लकड़ी पर निप्पल्स रगड़ खा रहे थे, वो बाल खींच रहा था, गांड पर और चाँटे मार रहा था। “बोल… किसका लौड़ा सबसे अच्छा लगता है साली, तेरे पति का या मेरा,” वो गरजा। “आपका सर… सिर्फ आपका… आह्ह… और जोर से… मैं आपकी गुलाम रंडी हूँ…”
मैं चीख रही थी, कूल्हे पीछे धकेल रही थी, रस बह रहा था, जाँघें तर हो गईं। वो और तेज ठोका, मेरी चूत से गीली, चिपचिपी आवाजें आ रही थीं, मैं तीन बार झड़ी, पैर काँप रहे थे, रस की गंध कमरे में फैल गई, लेकिन वो नहीं रुका, आखिर में गांड पर और चाँटे मारते हुए अंदर झड़ गया। “Free Gangbang Chudai Kahani”
“अब खाना खा, मेरी रंडी,” उसने कहा, और मुझे गोद में बिठाकर खुद खिलाया, उसके लौड़े की गर्मी और रस की गंध मेरी जाँघों पर लग रही थी। दोपहर में वो मुझे बिस्तर पर बाँधने लगा—मेरी साड़ी की चुन्नट से हाथ बाँधे, कलाइयों में कपड़ा कस गया, रगड़ खा रही थी, टाँगें फैलाईं, मंगलसूत्र को लौड़े से लिपटवाया, धातु की ठंडक और लौड़े की गर्मी दोनों मेरी छाती पर लग रही थीं।
“आज तुझे पूरी तरह तोड़ूँगा, तेरी संस्कारी सोच को चूत से निकाल दूँगा,” उसने कहा, और मेरी चूत पर लौड़ा रगड़ता रहा, दाने को दबाता रहा, लौड़े की नसें मेरी चूत की दीवारों पर रगड़ खा रही थीं, लेकिन अंदर नहीं डाला, मुझे तड़पाया। मेरी चूत में आग लगी हुई थी, रस बह रहा था, चादर तर हो गई.
उसकी गंध कमरे में फैल रही थी, मैं बंधी हुई छटपटा रही थी, कलाइयाँ दर्द कर रही थीं, “सर… प्लीज… घुसेड़ दो… तड़प रही हूँ… मेरी चूत जल रही है…” वो क्रूर हँसा, “माँग… अपने मुँह से बोल कि तेरी चूत मेरे लौड़े की गुलाम है और तेरी शादी की निशानी को मेरे रस से भर दो, तेरी इज्जत लूट लो।”
मैं टूट गई, अपराधबोध की आखिरी लहर आई, लेकिन हवस जीत गई, “हाँ सर… मेरी चूत आपकी गुलाम है… मेरे मंगलसूत्र को आपके रस से भर दो… मेरी इज्जत लूट लो… मैं आपकी सस्ती रंडी हूँ…” तब जाकर वो घुसा, इतने जोर से कि मैं चीख पड़ी, चूत फटने जैसा दर्द, लेकिन भराव का सुकून।
अलग अलग पोजिशन में ठोका—मुझे ऊपर बिठाया, कूल्हे पकड़कर उछाला, मेरे स्तन उसके मुँह में थे, वो काट रहा था, घोड़ी बनाकर बाल खींचे और गला हल्के से दबाया, साँस रुक सी गई, डर और मजा दोनों, साइड से लेते हुए निप्पल्स काटे, दाँतों के निशान पड़ गए।
हर बार वो हुक्म देता, “चीख… बोल कि मैं तेरी इज्जत लूट रहा हूँ और तू खुश है,” और मैं चीखती, “हाँ सर… लूट लो मेरी इज्जत… मैं आपकी रंडी बनकर खुश हूँ…” वो मेरे मुँह में डालता, गले तक घुसेड़ता, मैं ग्ग्ग्ग… करती निगलती, उसकी गंध और स्वाद सब कुछ महसूस कर रही थी। “Free Gangbang Chudai Kahani”
बालकनी पर ले जाकर दीवार से सटाया, पर्दे हल्के खुले थे, नीचे सड़क दिख रही थी, लोगों की आवाजें आ रही थीं, “अब चीखना जोर से, कोई सुन ले तो तेरी संस्कारी बहू की इज्जत गई, सबको पता चलेगा तू कितनी रंडी है,” उसने कहा, और पीछे से ठोका। मैं डर गई, दिल जोर से धड़का, लेकिन मजा इतना कि चीखी, “आह्ह… सर… फाड़ दो… आपकी रंडी हूँ… कोई देख ले तो देख ले… मेरी इज्जत आपकी है…”
और झड़ गई, रस जाँघों पर बह रहा था, हवा में ठंडक लग रही थी। वो फोन निकालकर वीडियो बनाने लगा, मेरा चेहरा छिपाकर, लेकिन मेरी चीखें और बॉडी दिख रही थी, “ये वीडियो तेरे पति को भेज दूँ तो क्या होगा, बोल साली, तेरी संस्कारी जिंदगी खत्म?”
मैं डर गई, रोने लगी, आँसू बह रहे थे, लेकिन चूत और सिकुड़ गई, रस और बहा, “सर… मत भेजना प्लीज… मैं आपकी गुलाम हूँ… जो चाहो करो… लेकिन और ठोको…” वो हँसा, वीडियो बंद किया, लेकिन दिमागी खेल ने मुझे और गुलाम बना दिया, अपराधबोध और हवस की आग और भड़क गई। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
शाम तक मेरी चूत सूज गई थी, लाल हो गई थी, गांड पर लाल निशान जल रहे थे, छूने पर भी दर्द और गर्मी, चलना मुश्किल था, कलाइयों पर बंधन के निशान, लेकिन मैं खुश थी जैसे कभी नहीं, बॉडी में एक अजीब सुकून और थकान। आखिरी बार वो मुझे बिस्तर पर दबाकर ठोका, धीरे धीरे लेकिन गहरा, मेरी आँखों में देखता रहा, मंगलसूत्र पकड़कर खींचता रहा, “मेरा रस अंदर चाहिए ना मेरी गुलाम रंडी, तेरी कोख मेरे बच्चे के लिए तैयार है ना?”
मैंने काँपती आवाज में कहा, “हाँ सर… भर दो… आपकी गुलाम बनकर ही जीना चाहती हूँ… आपकी कोख बनाओ मुझे।” वो जोर से ठोका, कोख में झड़ गया, गर्म रस इतना कि बहने लगा, मेरी कोख गरम हो गई, जैसे भर गई हो। हम लेटे रहे, वो मेरे बालों में उँगलियाँ फेर रहा था, उसकी उँगलियों की गर्मी महसूस हो रही थी, “अब हर दिन ऐसा ही होगा, और तेरे संस्कार हमेशा मेरे लौड़े तले कुचले जाएँगे।”
रात को अकेले में डर लगा कि कहीं गर्भ न ठहर जाए। मैंने कहा तो वो अपनी जेब से आईपिल निकाला, मुझे खिलाया, मेरे होंठों पर उंगली रखकर दबाया, “ले मेरी रंडी, अभी नहीं, जब मैं कहूँ तभी मेरी कोख भरेगी, तब तक सिर्फ मेरे लौड़े की गुलाम बन, मेरे हुक्म की तामील कर।”
मैंने गोली निगल ली, उसकी कड़वाहट मुँह में फैल गई, उसके गले लग गई, उसकी दबंग आवाज में सुकून मिल रहा था, उसकी छाती की गर्मी और धड़कन महसूस हो रही थी, और चुपके से प्रार्थना की, “भगवान जी, मुझे इस गुलामी में रखना, मुझे इस दबंग मालिक का लौड़ा हमेशा मिलता रहे,” लेकिन प्रार्थना में भी उसकी गंध, उसका रस, उसकी आवाज ही घूम रही थी।
ट्रिप की बाकी रातें भी उसके हुक्म की गुलामी में बीतीं, लेकिन वो पहला पूरा दिन कभी नहीं भूलूँगी—जब मैंने खुद को पूरी तरह उसके आगे झुका दिया, हर अपमान में डूबकर, हर दर्द में तड़पकर, सबसे बड़ी खुशी महसूस की, और मेरी संस्कारी सोच हमेशा के लिए टूटकर उसके लौड़े तले कुचल गई।
ट्रिप के आखिरी दिन रणविजय ने सुबह मुझे अपनी बाहों में जकड़कर कहा, “आज शाम बड़ा क्लाइंट मिलने वाला है, चार बड़े लोग हैं, डील बहुत बड़ी है, तुम्हें मेरे साथ चलना होगा उनके फार्महाउस पर।” मैंने कुछ समझा नहीं, लेकिन उसकी आँखों में वो ही दबंग चमक थी, तो मैंने हाँ कह दी।
दिन भर मीटिंग्स हुईं, मैं नोट्स लेती रही, लेकिन मेरी चूत में हर वक्त हल्की सी जलन बनी रही, जैसे कुछ बड़ा होने वाला हो। शाम को रणविजय ने मुझे अपनी चुनी हुई लाल साड़ी पहनने को कहा, ब्लाउज गहरा कट वाला, और अंदर कुछ न पहनने को हुक्म दिया। मैं शर्मा गई, लेकिन उसकी नजरों के सामने मना नहीं कर पाई, ब्रा और पैंटी नहीं पहनी।
साड़ी में स्तन उभरे हुए थे, निप्पल्स कपड़े पर रगड़ खा रहे थे, और नीचे हवा लगते ही चूत सिहर रही थी, रस की बूंदें जाँघों पर बहने लगीं। फार्महाउस दूर शहर से बाहर था, बड़ा गेट, अंदर हरा बगीचा, स्विमिंग पूल, और एक बड़ा हॉल। चार क्लाइंट्स पहले से बैठे थे—सब मोटे तगड़े, उम्र चालीस से ऊपर, मूंछें, दाढ़ियाँ, मर्दाना पसीने और इत्र की तेज गंध से भरे हुए, उनकी नजरें भूखी थीं।
रणविजय ने मुझे उनके सामने पेश किया, “ये मेरी सेक्रेटरी धैर्या है, आज ये आप सबकी सस्ती रंडी बनेगी, जो मर्जी करो।” सबकी नजरें मेरे बदन पर रुक गईं, स्तनों पर, कमर पर, और मैं शर्मा कर सिर झुका लिया, लेकिन चूत में रस टपकने लगा, पैंटी न होने से जाँघें तर हो गईं। “Free Gangbang Chudai Kahani”
डिनर हुआ, शराब पी, सबकी आँखें लाल हो गईं, और फिर रणविजय ने कहा, “धैर्या, इन सबको खुश करो, एक गंदी आइटम डांस करो, अपनी चूत और गांड दिखाकर।” मैं चौंकी, लेकिन उसकी नजरों में हुक्म था। म्यूजिक चला, पुराना गंदा गाना “चिकनी चमेली”, और रणविजय ने मेरे पल्लू खींच लिया। ये कहानी आप क्रेजी सेक्स स्टोरी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है.
मैं नाचने लगी, साड़ी घूम रही थी, स्तन उछल रहे थे, निप्पल्स सख्त होकर दिख रहे थे। सब तालियाँ बजा रहे थे, सीटियाँ मार रहे थे, “वाह साली… नाच… चूत मटका…” मैंने ब्लाउज के हुक खोले, ब्लाउज गिर गया, स्तन खुले, हवा लगते ही निप्पल्स और सख्त, सब चिल्लाए, “देखो ये रंडी के मम्मे…”
मैं नाचती रही, साड़ी सरकाई, पेटीकोट गिराया, अब पूरी नंगी खड़ी थी, मेरी गोरी त्वचा रोशनी में चमक रही थी, चूत के बाल गीले होकर चिपके हुए, रस जाँघों पर बह रहा था, गांड मटकाते वक्त सबकी आँखें उस पर टिक गईं। “कितनी गंदी रंडी है… चूत से रस टपक रहा है…”
सब हँस रहे थे, मैं घूमी, स्तन हिलाए, गांड मटकाई, चूत पर हाथ फेरकर दिखाया, और खुद को पूरी तरह उनके सामने सौंप दिया, मेरी चूत से रस की गंध हॉल में फैल गई। रणविजय ने कहा, “अब एक एक करके इनकी गंदी चुदाई करो, अपनी चूत और मुँह इनके लौड़ों से भरवाओ।”
पहला क्लाइंट आया, मोटा सा, मूंछ वाला, उसने मुझे सोफे पर लिटाया, मेरे मुँह में अपना मोटा लौड़ा ठूँस दिया, गंदी गंध आ रही थी, वो गले तक घुसेड़ रहा था, “चूस साली… अपनी संस्कारी मुँह से मेरे लौड़े को साफ कर,” मैं ग्ग्ग्ग… गों गों… करती चूसती रही, थूक बह रहा था, आँसू बह रहे थे.
फिर वो चूत में घुसा, जोर जोर से ठोका, मेरे स्तनों को मसलता रहा, निप्पल्स मरोड़ता रहा, “कितनी टाइट चूत है रंडी… तेरे पति ने कभी नहीं ठोका क्या?” मैं चीख रही थी, “आह्ह… हाँ… ठोको… फाड़ दो…” वो कोख में झड़ा, गर्म रस भर दिया। दूसरा आया, दाढ़ी वाला, मुझे घोड़ी बनाया, गांड पर जोरदार चाँटे मारे, “तेरी गांड लाल करूँगा साली,” जलन फैल गई.
फिर पीछे से घुसा, बाल खींचकर ठोका, लौड़ा चूत की दीवारें रगड़ रहा था, “बोल… मेरी रंडी है तू,” मैं बोली, “हाँ… आपकी रंडी… गांड मारो…” वो हँसा, और गांड में उंगली डालकर साथ साथ ठोका, मैं सिसक रही थी, रस बह रहा था। तीसरा मुझे गोद में उठाकर ठोका, स्तनों को चूसता रहा, निप्पल्स काटे, दाँतों के निशान पड़ गए, “तेरे मम्मे चूस चूसकर लाल कर दूँगा.”
मैं उसके गले लिपटकर चीखी, “आह्ह… चूसो… काटो…” वो मुँह में झड़ा, मैं निगल गई। चौथा सबसे गंदा था, मुझे दीवार से सटाकर खड़ा किया, टाँग ऊपर उठवाई, गहरा घुसा, गला दबाया, साँस रुक रही थी, “बोल… मेरी सस्ती रंडी है तू, तेरी चूत मेरे रस से भरी रहेगी.”
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मैं बोली, “हाँ… सस्ती रंडी हूँ… भर दो…” वो कोख में झड़ा, रस बहने लगा। रणविजय आखिरी था, सब देख रहे थे, उसने मुझे फर्श पर लिटाया, सबके सामने ठोका, “देखो साले… मेरी गुलाम रंडी को कैसे ठोकता हूँ, इसकी चूत सिर्फ मेरे लिए,” और जोर जोर से धक्के मारे, फच फच की आवाजें, मैं चीख चीखकर झड़ रही थी, रस की गंध पूरे हॉल में। “Free Gangbang Chudai Kahani”
फिर सब मिलकर आए, मुझे बीच में लिटाया, एक मुँह में लौड़ा ठूँस दिया, ग्ग्ग्ग… करती चूसती रही, एक चूत में घुसा, फच फच ठुकाई, दो हाथों में लौड़े पकड़कर हिलाती रही, एक मेरे स्तनों पर रगड़ रहा था। सब तरफ लौड़े, गंदी गंध, पसीना, रस, थूक। सब बारी बारी बदलते, कोई गांड में घुसा, दर्द से चीखी लेकिन मजा आया, “आह्ह… गांड फाड़ दो…”
कोई मुँह में झड़ा, निगलवाया, कोई स्तनों पर गिराया, चिपचिपा रस बह रहा था। मैं पागल हो गई, चीखती रही, “आह्ह… और… सब ठोको… मुझे गंदी रंडी बनाओ… चूत गांड मुँह सब भर दो…” सबने मिलकर मुझे तड़पाया, झड़वाया, चूत में, गांड में, मुँह में, स्तनों पर रस गिराया, मैं रस से लथपथ पड़ी थी, बॉडी पर सफेद धारियाँ, चूत से रस और वीर्य बह रहा था, गंध पूरे कमरे में, मैं खुशी से रो पड़ी।
रात खत्म होने पर सबने मुझे पैसे दिए—हर एक ने बीस हजार रुपए, कुल एक लाख, मेरे हाथ में ठूँसते हुए बोले, “तेरी गंदी खिदमत के लिए सस्ती रंडी, फिर बुलाएँगे।” मैंने पैसे लिए, शर्म और अपमान में भी चूत सिकुड़ गई। अगली सुबह हम वापस लौटे। घर पहुँचकर श्वेतांक ने पूछा, “ट्रिप कैसी रही?”
मैंने कहा, “अच्छी रही, डील पक्की हो गई।” लेकिन मेरी चूत में अभी भी उनकी गर्मी और रस की गंध थी, गांड में जलन बाकी थी। अगले दिन ऑफिस में रणविजय ने मुझे बुलाया, सैलरी स्लिप दी—पचास प्रतिशत हाइक। मैं खुश हो गई, लेकिन वो मुस्कुराया, “ये किसी को मत बताना, सबको पता चल जाएगा हाइक कैसे मिली है, मेरी सस्ती रंडी को क्लाइंट्स की चुदाई से।”
मैं शर्मा गई, लेकिन हाँ कह दी। अब हर हफ्ते रणविजय मुझे अपनी गुप्त फ्लैट पर ले जाता है, वहाँ पूरा दिन मुझे गंदी तरह ठोकता है, हुक्म देता है, गुलाम बनाता है, और मैं खुश हूँ अपनी इस नई जिंदगी में, अपनी चूत और बॉडी को उसके और उसके दोस्तों के लिए खुला रखकर।
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