Sex story रोजाना मूठ मारना, hindi adult story, पड़ोसन चुदाई कहानी
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पटना की उन तंग गलियों में, जहाँ बिजली की तारें लटकी रहती हैं और रात को सन्नाटा इतना गहरा होता है कि अपनी साँसें भी सुनाई देने लगती हैं, प्रवीण की छोटी-सी किराए की दुकान के ऊपर का कमरा था। कमरा कहने लायक था—एक टूटी-फूटी चारपाई, दीवार पर पुरानी पोस्टर चिपके, और एक छोटी-सी खिड़की जिससे रात को पड़ोस के घर की रोशनी आती थी। प्रवीण २९ का था। दिन भर दुकान पर ग्राहकों से लड़ता, शाम को घर लौटता, खाना खाता और बिस्तर पर लेटते ही हाथ नीचे चला जाता। रोजाना। मोठ मारता, आँखें बंद करता और सो जाता। कभी-कभी सोचता भी था—क्या यही जिंदगी है? लेकिन जवाब कभी नहीं ढूंढता। बस कर लेता। क्योंकि ये आसान था। बिना किसी को बताए, बिना किसी को छुए।
सालों से यही चल रहा था। कभी कोई लड़की नहीं आई उसके करीब। परिवार में माँ-बाप थे, लेकिन वो दोनों गांव में रहते थे। पटना में वो अकेला। दोस्त थे, लेकिन कोई इतना करीबी नहीं कि दिल की बात कह सके। रातें लंबी लगतीं। हाथ तेज चलता, मन खाली रहता। कभी-कभी सोचता—काश कोई हो जो स्पर्श करे, जो नाम ले, जो सांसों में सांस मिलाए। लेकिन ये सिर्फ सोच था। हकीकत में वो अकेला ही सो जाता।
फिर एक शाम सलोनी आई। पड़ोस के कमरे में किराए पर रहने वाली लड़की। २६ साल की। स्कूल टीचर। सुबह निकलती, शाम को लौटती। कभी-कभी सीढ़ियों पर मिल जाती। प्रवीण की नजर उस पर ठहर जाती। सलोनी की चाल में एक अजीब सी नरमी थी। साड़ी का पल्लू कभी-कभी सरक जाता, कमर की एक झलक दिख जाती। प्रवीण मुड़ जाता। मन में एक हलचल होती। लेकिन वो खुद को रोक लेता। “पड़ोसन है। क्या सोचेगी?”
एक रात बारिश बहुत तेज हुई। बिजली चली गई। कमरा अंधेरा। प्रवीण बिस्तर पर लेटा था। हाथ फिर नीचे जाने लगा। लेकिन तभी बाहर से आवाज आई—”कौन है?” सलोनी की आवाज। डरती हुई। प्रवीण उठा। दरवाजा खोला। सलोनी बाहर खड़ी थी। मोमबत्ती हाथ में। “भैया… मेरे कमरे में पानी टपक रहा है। छत से। डर लग रहा है।” प्रवीण ने देखा। बाहर पानी बरस रहा था। “आ जाओ अंदर।” वो बोला। सलोनी हिचकिचाई। लेकिन अंदर आई। कमरे में मोमबत्ती की रोशनी। दोनों सोफे पर बैठे। सलोनी की साड़ी गीली हो गई थी। शरीर से चिपक रही थी। प्रवीण की नजर उसके स्तनों पर गई। वो झटके से नजर हटाया। मन में तूफान। “ये क्या कर रहा हूँ मैं?”
सलोनी बोली—”मुझे माफ करना। इतनी रात को…” प्रवीण ने कहा—”कोई बात नहीं। बारिश रुकने तक रुक जाओ।” दोनों चुप। सिर्फ बारिश की आवाज। प्रवीण का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। सलोनी की महक आ रही थी। हल्की साबुन की। वो करीब बैठी थी। कंधे लग रहे थे। प्रवीण ने धीरे से कहा—”तुम ठंडी हो गई हो।” सलोनी ने सिर हिलाया। प्रवीण ने अपनी शाल निकाली। उसके कंधे पर डाली। सलोनी ने मुस्कुराकर कहा—”शुक्रिया।” उनकी उँगलियाँ छू गईं। प्रवीण का शरीर सिहर गया। वो हाथ नहीं हटाया। सलोनी ने भी नहीं। चुप्पी और गहरी हो गई।
धीरे-धीरे बातें शुरू हुईं। सलोनी ने बताया—वो अकेली रहती है। परिवार दूर है। रातें डरावनी लगती हैं। प्रवीण ने सुना। मन में एक अजीब सी करुणा। और साथ ही वो पुरानी प्यास। वो सोच रहा था—”अगर मैंने हाथ बढ़ाया तो?” लेकिन डर भी था। “पड़ोसन है। कल क्या होगा?” सलोनी ने अचानक कहा—”तुम भी अकेले हो न?” प्रवीण ने हाँ में सिर हिलाया। सलोनी की आँखें उसकी आँखों में। “कभी… किसी को…” वो रुक गई। प्रवीण का गला सूख गया। “कभी नहीं।” वो बोला। सलोनी ने धीरे से हाथ उसकी जांघ पर रखा। “मुझे भी नहीं।”
उस रात कुछ नहीं हुआ। सिर्फ हाथ पकड़े रहे। लेकिन वो स्पर्श प्रवीण के अंदर आग लगा गया। अगले दिन से चीजें बदलने लगीं। सलोनी अब ज्यादा आती। कभी चाय पीने, कभी बात करने। प्रवीण की दुकान बंद होने के बाद वो ऊपर आ जाती। दोनों साथ बैठते। नजरें मिलतीं। चुप रहते। लेकिन वो चुप्पी बोलती थी। प्रवीण अब रोजाना मोठ नहीं मारता। इंतजार करता। सलोनी की याद में। उसकी कमर, उसकी आँखें, उसकी साड़ी की सिलवटें। मन में अपराधबोध। “ये गलत है।” लेकिन शरीर नहीं मानता।
एक शाम सलोनी आई। “आज मेरे कमरे में आओ। छत ठीक हो गई है।” प्रवीण गया। कमरा छोटा था। लेकिन साफ। सलोनी ने चाय बनाई। दोनों बिस्तर पर बैठे। बातें हुईं। फिर चुप्पी। प्रवीण ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा। सलोनी ने नहीं छोड़ा। वो करीब आई। प्रवीण ने उसके गाल को छुआ। सलोनी ने आँखें बंद कीं। प्रवीण ने होंठ उसके होंठों पर रखे। नरम। गहरा। सलोनी ने जवाब दिया। जीभें मिलीं। दोनों के शरीर सटे। प्रवीण के हाथ सलोनी की पीठ पर। साड़ी का पल्लू सरका। ब्लाउज के हुक खुले। सलोनी की साँसें तेज। “प्रवीण… डर लग रहा है…” प्रवीण ने कहा—”मुझे भी। लेकिन रुकना नहीं चाहता।”
सलोनी ने साड़ी उतारी। ब्रा उतारी। उसके स्तन बाहर। प्रवीण ने छुए। सलोनी सिसकारी—”आह…” प्रवीण ने मुँह में लिया। चूसा। सलोनी की कमर उछल रही थी। प्रवीण नीचे गया। पेटीकोट खोला। पैंटी गीली। उतारी। सलोनी की चूत नंगी। प्रवीण ने जीभ लगाई। सलोनी चीखी—”ओह्ह… कितना अच्छा…” प्रवीण चाटता रहा। सलोनी झड़ गई। प्रवीण ऊपर आया। कपड़े उतारे। उसका लंड सख्त। सलोनी ने पकड़ा। “कितना गरम…” वो बोली। प्रवीण ने उसे लिटाया। लंड चूत पर रखा। धीरे से अंदर। सलोनी की आँखें बंद। “आह… धीरे…” प्रवीण धक्के मारने लगा। सलोनी की गांड दबा रहा था। “तेरी गांड कितनी मुलायम…” सलोनी बोली—”जोर से… चोदो मुझे…” दोनों की सिसकारियाँ। कमरा भर गया। प्रवीण तेज हुआ। “सलोनी… आ रहा हूँ…” सलोनी बोली—”अंदर… डालो…” प्रवीण झड़ गया। दोनों थककर लेटे।
उसके बाद रातें बदल गईं। रोजाना। सलोनी प्रवीण के कमरे में आती। या प्रवीण उसके। दोनों एक-दूसरे को छूते। चूमते। चोदते। लेकिन मन में एक डर। “अगर किसी को पता चला तो?” पड़ोस वाले। परिवार। समाज। लेकिन वो डर उन्हें और करीब लाता। एक रात सलोनी रो पड़ी। “प्रवीण… हम क्या कर रहे हैं?” प्रवीण ने गले लगाया। “जो दिल कहता है।” सलोनी बोली—”मुझे प्यार हो गया है।” प्रवीण ने कहा—”मुझे भी। बहुत।”
समय बीतता गया। दोनों अब एक-दूसरे के बिना नहीं रह पाते। लेकिन बाहर सब सामान्य। पड़ोस में वो सिर्फ पड़ोसी। लेकिन रातें उनकी। गहरी। गरम। सलोनी की चूत प्रवीण के लंड के लिए तरसती। प्रवीण सलोनी की गांड को चूमता। दोनों एक-दूसरे में खो जाते। लेकिन मन में एक सवाल। “ये कब तक?”
एक रात सलोनी बोली—”मुझे शादी करनी है। परिवार दबाव डाल रहा है।” प्रवीण चुप रहा। दिल टूट गया। लेकिन बोला—”जो तुम्हारी खुशी हो।” सलोनी रो पड़ी। “मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।” प्रवीण ने कहा—”तो मत रहो।” दोनों लिपटे। आखिरी बार नहीं। लेकिन वो रात अलग थी। ज्यादा गहरी। ज्यादा दर्द भरी। सलोनी बोली—”तुम्हें कभी नहीं भूलूँगी।” प्रवीण ने कहा—”मैं भी नहीं।”
सलोनी चली गई। शादी हो गई। प्रवीण अकेला रह गया। लेकिन अब मोठ नहीं मारता। क्योंकि अब यादें थीं। सच्ची। गरम। दर्द भरी। वो रातें जो कभी खत्म नहीं होतीं। मन में बसती रहतीं। पटना की उन तंग गलियों में। जहाँ सन्नाटा अब भी है। लेकिन प्रवीण के कमरे में अब एक खालीपन है। जो कभी नहीं भरने वाला। क्योंकि वो खालीपन सलोनी से भरा हुआ है। और सलोनी अब दूर है। लेकिन उसके स्पर्श अभी भी महसूस होते हैं। हर रात। हर साँस में।
